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"विश्वास"
विश्वास -- यह शब्द कह कर इंसान यह बता देता है कि कहीं न कहीं उसके ज़ेहन में अविश्वास है.
इंसान -- खुद ही शक पैदा करता है और अपनी इस कमज़ोरी को दूसरों पर आरोपित कर देता है.
यह कह कर कि तुमने मेरे विश्वास को तोड़ा है.
ये विश्वास क्या है?
मेरी नज़र में... अपने विश्वास पर अति विश्वास अंधविश्वास है और शक की ज़रा सी दरार विश्वासघात है.
फिर इंसान अपने से अधिक यकीन दूसरों पर क्यों करता है?
अपने यकीन पर यकीन रखोगे तो न अंधविश्वास होगा और न ही विश्वासघात.
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शमां
मैं, शमां दान की अधजली शमां हूँ.
जब, अंधेरा होता है , तो जला ली जाती हूँ मैं, और उजेरा होते ही एक फूंक से , बुझा दी जाती हूँ मैं.
ओ रोशनी के दीवानो क्या पाते हो ऐसे तुम? क्यों नही जलने देते पूरा क्षण - क्षण जला बुझा कर तुम.
मत यूँ बुझाओ मुझको ज्यादा दर्द होता है कि पिघलता हुआ मोम ज्यादा गर्म होता है.
पिघलने दो उसे यूँ बुझा कर ठंडा ना करो जलते हुए मिलने वाले उस सुख को ना हरो.
चाहती हूँ मैं कि मुझे एक बार जला दो कि उस आग को , भड़कने के लिए, बस थोड़ी सी हवा दो .
मैं एक बार पूरी तरह जलना चाहती हूँ अपनी ज़िंदगी इसी तरह पूरी करना चाहती हूँ.
मैं , हल्की सी फूंक का बस एक तमाशा हूँ मैं शमां दान की अधजली शमां हूँ
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TRISHNA
मरुस्थल रूपी हृदय में
तृष्णाएँ
गर्म तपती बालू हैं
क्या कभी
हरियाली के लिए
नेह रूपी जल मिलेगा?
या कि
मृगतृष्णा में ही
भटक जाएगा जीवन
मन और आँखें दोनो ही
आकाश को ताकते हुए
जलधर की प्रतीक्षा में
पुलकित होते हुए
मात्र ज़िंदगी एक
उच्छ्वास ही बन जाएगी...
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AHAM (MAIN)
ये आसमां और मेरे अरमान दूरी दोनो की एक जितनी संभव जब-जब आसमां तक निगाह उठी अरमानों का रेला सामने चला आता है.
ये तारे और मेरी चाहतें दोनो की एक जितनी संख्या संभव जब- जब तारे गिनने की कोशिश की मेरी चाहतों का ढेर लग जाता है.
ये नदियाँ और मेरी कल्पनाएँ दोनो का स्वभाव एक जैसा संभव जब - जब लहरों को गिनना चाहा मेरी कल्पना का समुद्र सामने आ जाता है.
तुम और मैं , मैं और तुम एक जैसे संभव जब भी तुम तक पहुँचने की कोशिश की मेरा 'मैं ' मेरे सामने आ जाता है.
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Mukhoton Se Dhake Chehare
इंसान के चेहरे कितने मुखोटों से ढके होते हैं कि पहचानना मुश्किल होता है कि असली चेहरा कौन सा है.
हम लाख दावा कर लें कि इस इंसान को, अच्छी तरह जानते हैं, उसकी नस - नस पहचानते हैं पर इतने विश्वास के बाद भी अक्सर धोखा खाते हैं क्यों कि हम चेहरे पर चढ़े मुखोटे को ही केवल पहचान पाते हैं.
अचानक बदल जाता है मुखोटा और हम हतप्रभ से रह जाते हैं यह सोचते हुए कि शायद असली चेहरा यही है, और फिर उस चेहरे को पढ़ते हुए सोचने लगते हैं कि अब तो हम असलियत पहचान गये हैं इस इंसान को अच्छी तरह जान गये हैं.
परंतु फिर विश्वास टूट जाता है यह देख कर कि यह भी चेहरे पर ओढ़ा हुआ एक मुखोटा ही था ज़िंदगी में मिला , एक और धोखा ही था.
यही धोखा खाते- खाते सारी ज़िंदगी खत्म हो जाती है और अंत में खुद ज़िंदगी ही हमें धोखा दे जाती है.
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JANMDIN PAR SHRADHANJALI
कहलाए तुम दूत शांति केअग्रदूत तुम विशव शांति के जिओ और जीने दो के समर्थक विरोधी तुम जाति- पांती के. तुमने देखे थै कुछ सपने स्वतंत्र भारत के थै अपने अग्रणी राष्ट्र बनाने को प्रयास किए थै कुछ अपने
तुमने जो राह दिखाई थी उसपर जनता चल आई थी विकासशीलता के पथ पर चल बाढ़ उद्योगों की आई थी. देश प्रगति पथ पर चल पड़ा ध्वज शांति का लिए खड़ा तुम्हारे सपनो का भारत है आज दोराहे पर खड़ा. विशव शांति के स्वप्न तुम्हारे आज खंड- खंड पड़े हुऐ घर मैं शांति बनाने को मन जनता के त्रस्त हुऐ बात विशव की करते हो घर मैं शांति कहाँ रह पाई भारत के टुकड़े करने की लोगों के मन मैं फिर आई गाँव-गाँव शहर-शहर एक उत्पात मचा हुआ है विश्व शांति का स्वप्न तुम्हारा किसी कब्र मैं दबा हुआ है जन्म-दिवस तुम्हारा मना रहे हम दूत शांति का कहते हैं पर अशांति के सर्पों को हम दूध पिलाया करते हैं मूल्यांकन तुम्हारे कर्मो का हम आज विचारों मैं करते हैं पर अपने मूल्य भुला कर हम केवल भाषण बोला करते हैं कब तक भाषण से राष्ट्र चलेगा कब यहाँ शांति बन पाएगी तब तक भारत की जनता शायद हर पल यहाँ ठगी जाएगी जनता को स्वयं उठना होगा ध्वज शांति का लिए हुऐ तब ही राष्ट्र कह पाएगा तुम विशव शांति के दूत हुऐ जन-जन मैं जब शांति व्यापेगी जनता निर्द्वन्द सुखी होगी आतंकवाद के खंडहर पर वही सच्ची शायद श्रढांजलि होगी .
संगीता स्वरूप (गतिका )
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DOSTI
दोस्ती का सबब चाहो गर पूछना , तो पूछो तुम ख़ुद से . दोस्ती से अच्छा रिश्ता, इस जहाँ मैं कोई होता नही . गर मिल जाए केवल , एक दोस्त इस ज़िंदगी मैं, तो ज़िंदगी भर , आदमी तन्हा होता नही.
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गर रिश्तों मैं कर सको दोस्ती पैदा, तो ज़िंदगी सुकून से बीत जाएगी, गर दोस्ती को रिश्तों मैं बाँधोगे, तो ज़िंदगी यूँ ही रीत जाएगी..
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yatharth (jeewan ka satya)
फूल ने कली से मुस्कुरा के कहा ,
की तेरे पर भी
बहार आएगी.
तू भी फूल
बनते- बनते यूँ ही
बिखर जाएगी.
पर कली ने
उस बात का
वो राज ना जाना
उसकी उस बात को
ज़रा सच ना माना.
पर आया जब वक़्त तो
वो फूल बन गई
मस्ती से भर के
वो यूँ ही बिखर गयी.
अपने हालात पर वो
काफ़ी दुखी थी,
कहती है फूल से ,मुझे माफ़ करो
मैं तुम पर यूँ ही हँसी थी.
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antar
हैं दोनो भेद रहित फिर भी देखो कितना अंतर है एक मन मंदिर मैं वास रहा दूजा सड़कों का पत्थर है.
तूने चाहा फूलों की महक को मैने काँटो को अपनाया है तूने ख़ुशियों की रंगीनी देखी मैने अश्कों के लिए सूना दामन फैलाया है. तूने दूधिया स्नात चाँदनी मैं अपना प्यार लूटाया है मैने अमवास की रातों मैं अपने दर्द को दफ़नाया है तूने ख़ुशी की चाहत मैं दूसरे का दर्द नही देखा मैने तेरे दर्द के लिए ह र ख़ुशी को ठुकराया है तूने शीशे के महलों से इस दुनिया को देखा है मैने ठोकर खा-खा कर इस दुनिया को अपनाया है. है तेरी ज़िंदगी बसंत रितु हर ख़ुशी का फूल खिल जाएगा मेरी ज़िंदगी है पत्छ्र्र जिसमे हर पत्ता गिर जाएगा हैं दोनो भेद रहित फिर भी देखो कितना अंतर है एक मन मंदिर मैं वास रहा दूजा सड़कों का पत्थर है
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IBARAT
ZINDAGI BHAR HUM RISHATOON KI IBAARAT LIKHATE RAHE, KABHI SAHI AUR KABHI GALAT KARATE RAHE KABHI LIKHA, KABHI KATA AUR KABHI MITAYA, LEKIN PHIR BHI, HUMNE HAR RISHTA NIBHYA. LEKIN JAHAAN HUMNE, RISHTA NIBHAYA WAHIN SE SABSE ADHIK DHOKHA KHAYA ABB JA KAR SAMAJH AAYA KI ZINDAGI ISI KA NAAM HAI...........
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