|
|
|
|
| Wednesday 20 August, 2008 |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
antar
हैं दोनो भेद रहित फिर भी देखो कितना अंतर है एक मन मंदिर मैं वास रहा दूजा सड़कों का पत्थर है.
तूने चाहा फूलों की महक को मैने काँटो को अपनाया है तूने ख़ुशियों की रंगीनी देखी मैने अश्कों के लिए सूना दामन फैलाया है. तूने दूधिया स्नात चाँदनी मैं अपना प्यार लूटाया है मैने अमवास की रातों मैं अपने दर्द को दफ़नाया है तूने ख़ुशी की चाहत मैं दूसरे का दर्द नही देखा मैने तेरे दर्द के लिए ह र ख़ुशी को ठुकराया है तूने शीशे के महलों से इस दुनिया को देखा है मैने ठोकर खा-खा कर इस दुनिया को अपनाया है. है तेरी ज़िंदगी बसंत रितु हर ख़ुशी का फूल खिल जाएगा मेरी ज़िंदगी है पत्छ्र्र जिसमे हर पत्ता गिर जाएगा हैं दोनो भेद रहित फिर भी देखो कितना अंतर है एक मन मंदिर मैं वास रहा दूजा सड़कों का पत्थर है
|
|
| | |
|
|
|
|
|
|
|