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| Wednesday 20 August, 2008 |
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TRISHNA
मरुस्थल रूपी हृदय में
तृष्णाएँ
गर्म तपती बालू हैं
क्या कभी
हरियाली के लिए
नेह रूपी जल मिलेगा?
या कि
मृगतृष्णा में ही
भटक जाएगा जीवन
मन और आँखें दोनो ही
आकाश को ताकते हुए
जलधर की प्रतीक्षा में
पुलकित होते हुए
मात्र ज़िंदगी एक
उच्छ्वास ही बन जाएगी...
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