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sangeeta swarup
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Wednesday 20 August, 2008
 23:49 | 28/Mar/2008 |  3 Comment(s)
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      शमां

मैं,
शमां दान की
अधजली शमां हूँ.

जब,
अंधेरा होता है ,
तो जला ली जाती हूँ मैं,
और उजेरा होते ही
एक फूंक से ,
बुझा दी जाती हूँ मैं.

ओ रोशनी के दीवानो
क्या पाते हो ऐसे तुम?
क्यों नही जलने देते पूरा
क्षण - क्षण
जला बुझा कर तुम.

मत यूँ बुझाओ मुझको
ज्यादा दर्द होता है
कि
पिघलता हुआ मोम
ज्यादा गर्म होता है.

पिघलने दो उसे
यूँ बुझा कर
ठंडा ना करो
जलते हुए मिलने वाले
उस सुख को ना हरो.

चाहती हूँ मैं कि
मुझे एक बार जला दो
कि उस आग को ,
भड़कने के लिए,
बस थोड़ी सी हवा दो .

मैं एक बार पूरी तरह
जलना चाहती हूँ
अपनी ज़िंदगी इसी तरह
पूरी करना चाहती हूँ.

मैं ,
हल्की सी फूंक का
बस एक तमाशा हूँ
मैं शमां दान की
अधजली शमां हूँ


Category: Poetry | Permalink